Monday, September 30, 2013

खोलो निज मन द्वार सखी हे!

खोलो निज मन द्वार सखी हे!, खोलो निज मन द्वार,
परिवर्तन है जगत का नियम, करो इसे स्वीकार सखी हे! 
खोलो निज मन द्वार।  

आता बसंत उन्माद जगाने, वर्षा आती प्यास बुझाने 
ग्रीष्म कठिन संघर्ष सिखाये, शीत ताप से मुक्ति दिलाये,
समय -समय पर ऋतुएं बदलें, करो इनका आभास,
करो इनका सत्कार, होना न तु उदास सखी हे !
खोलो निज मन द्वार। 

ऐसा नहीं कि नीरस है मन, ऐसा नहीं कि आस नहीं है,
जीवन के विभिन्न रंगों की, मन में अपने चाह नहीं है,
जीवन के उत्थान -पतन का, निज मन में आभास नहीं है,
अच्छे -बुरे के द्वन्द में न पिसो, करो अपना उपकार सखी हे!
खोलो निज मन द्वार। 

तन चाहे मिल जाते लाखों, मन चाहा मुश्किल से मिलता,
मन चाहे को मीत बना लो, हृदय का करो  श्रृंगार,
मन चाहा अगर मीत मिले तो, चलो संग कदम चार, 
करो कुछ उसका भी उपकार, मिले हैं दिन जीवन में चार सखी हे !
खोलो मन के द्वार। 

बिना  स्वप्न उत्थान नहीं है, बिना जुड़े निर्माण नहीं है
सपने  पलकों पे सजने दो, मन के तारों को जुड़ने दो,
सपने पूरे जब होते हैं, खुशियाँ मिलती अपार सखी हे!
मिलन -विछोह जीवन के रस हैं, करो इनका रसपान सखी हे!
खोलो निज मन द्वार। 

परिवर्तन है जगत का नियम, करो इसे स्वीकार सखी हे! 
खोलो निज मन द्वार । 

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