Thursday, December 1, 2016

तेरी यादों में जिए जाता हूँ

कुछ यूँ  खुद से, छल मैं किये जाता हूँ ,
तू न सही , तेरी यादों में जिए जाता हूँ।  

किया जो वादा, न बहेंगे मोतियों जैसे आँसू ,
उनकी हिफाज़त मैं, बन के सीप किये जाता हूँ। 

तेरी उम्मीदें, ख़्वाहिशें, सपने, मन्नतें  तेरी,
'वो' करें पूरी,  दुआयेँ  मैं किये जाता हूँ। 

बन के ख़्वाब यूँ नींद में ना आया करो ,
कि उसे मैं हक़ीक़त में जिए जाता हूँ। 

बन के ख़ुशबू , फिजाओं में सदा बिखरे रहो,
कि इसी उम्मीद में , मैं साँस लिए जाता हूँ। 

रहो आबाद सदा अपनी हसीन दुनिया में,  
मैं वो शख़्श हूँ, जो दुआओं में जिए जाता हूँ।  

Thursday, October 3, 2013

विवाह की सातवीं वर्षगाँठ *

मैं हूँ वही, तुम हो वही, तारीख भी वही है,  
प्रिये ! उमड़ते ज़ेहन में, नये -नये जज़्बात। 

तुम हो वहां, मैं हूँ यहाँ, फिर आ गयी अप्रैल बीस,
हो गयी ये तो बात पुरानी, हैं नये-नये अरमान। 

पलक झपकते गुज़र गए, फेरे जितने साल,
प्रीति पुरानी हो गयी अपनी, हैं नये -नये मेहमान। 

तुम हो वही मैं हूँ वही और घर भी तो वही है,
पर अपनी जिन्दगी में हैं, अब नये -नये सामान। 

मैं हूँ वही, तुम हो वही और नाम भी वही हैं,
पर अपनी इस शहर से, हुई नयी -नयी पहचान। 

चूल्हा वही, चक्की वही, वही सुगढ़ तेरे हाथ ,
प्रिय ! रसोई में तेरे, हैं नये-नये पकवान।

मैं हूँ वही, तुम हो वही , सर पर हैं वही हाथ,
दम्पति हैं हम तो पहले से, अब दो के हैं माँ -बाप।  

*यह कविता शादी की सातवीं वर्षगाँठ  सन २००७ में लखनऊ में लिखी  गयी । 

Tuesday, October 1, 2013

सुन सखि ! कर्तव्य है बड़ा प्रेम से

सुन सखि ! कर्तव्य है बड़ा प्रेम से 

ज्यों पृथ्वी से आकाश बड़ा है, ज्यों धन से सम्मान बड़ा है,
निर्धन से धनवान बड़ा है, दुर्बल से बलवान बड़ा है। 
सुन सखि ! बुद्धि बड़ी है बल से। 

कायर को नहीं क्षमा शोभती, उजाले में नहीं ज्योति,
ज्ञानी को नहीं क्रोध शोभता, बिनु विवेक नहीं बुद्धि,
सुन सखि ! विनय बड़ा विवेक से। 

पुष्पों की सुगंध है प्यारी, नव वधु की लज्जा है न्यारी,
प्रियतम की मुस्कान के आगे, फीकी लगती दुनिया सारी,
सुन सखि ! प्रेम बड़ा प्रीतम से। 

जिसने कर्तव्य करने की ठानी,  कोई नहीं है उसका सानी,
कृति अमर कर देती उसको, दे जाता है अमिट निशानी ,
सुन सखि ! कर्तव्य बड़ा जीवन से। 

रीता है जो हृदय प्रेम से, वंचित है वो जीवन सुख से,
परिपक्व बनाता है कर्तव्य, परिचय करवा कर यथार्थ से,
सुन सखि ! हृदय प्रेम बिन सूना। 

प्रेम जगाता आलस तन में, सुध-बुध खोता प्राणी 
लाठी ले कर्तव्य खड़ा हो, करने न देता नादानी। 
लोक लाज तजि प्रेम दौड़ता, अपना प्रिय पाने को,
 सही मार्ग कर्तव्य दिखाता मर्यादा अपनाने को। 
सुन सखि ! कर्तव्य है बड़ा प्रेम से।

सुन सखि ! प्रेम के कैसे रंग….

निर्मल है ज्यों धारा जल की,  शीतल है ज्यों पवन बसंती,
मधुर है ज्यों कोयल क़ी कू-कू, विरहाकुल पपीहे की पी-पी,
तपन अग्नि का है ज्यों गुण, तीखापन ज्यों मिर्ची का,
गुड़ का गुण ज्यों मीठापन, खट्टापन ज्यों इमली का,
कोमल ज्यों पंखुड़ी कमल की, स्निग्ध है जो मक्खन सी,
रजनीगन्धा की सुगंध ज्यों, सुन्दर है जो प्रकृति जैसी। 
पावन है गंगाजल जैसे, प्रेम के अनुभव हैं कुछ ऐसे। 

सुन सखि ! अब महिमा दोनों की -
जहाँ मिला कर्तव्य प्रेम से, प्रेम उच्च हो जाता,
मोक्ष लक्ष्य जिस जीवन का है, लक्ष्य वो अपना पाता। 




बचपन की यादें और अब

बचपन के जो संगी साथी, याद हमेशा उनकी आती,
बागों क़ी कलियाँ, गाँव की गलियां, टनटनाती मंदिर की घंटियाँ,
गुल्ली-डंडा शुर्र, तमाशा, झट से बड़े होने की आशा,
माँ की लोरी सुन सो जाना, पापा की बोली सुन उठ जाना,
सुबह सवेरे उठकर हम सब, बड़े बुजुर्गों के छूते पांव,
बाबा की लाठी का भय मन में, दादी का आँचल देता छाँव,
खेत भरे, खलिहान पटे, अन्न की रहती भरमार,
बाग़ में टपका लपक लेने को, आपस में हो जाती मार,
वर्षा में माटी की सुगंध,  ठण्ड कड़कती उस पर धुंध,
किस्से वो जलती अलाव पर, भूजना होरहे चोरी कर, 
शिक्षित होने को घर छूटा, मकान किराए का, घर अपना टूटा,
शहर बुलाया रोज़गार ने, प्रकृति की गोदी छूटी,
भागमभाग है धन के पीछे, सुख शांति की गगरी फूटी।  

Monday, September 30, 2013

श्रृद्धांजलि : जब तुम थे अपनापन था

यूँ तो हर कोई तन्हा होता है, पर जब तुम थे अपनापन था। 
किसी के लिए भी कोई कब तक रोता है, पर जब बात चली, आँखों में गीलापन था। 

रह गए कितने काम अधूरे, कितनी आशाएं टूट गयीं,
एक तुम्हारे जाने से, जीवन में कितना सूनापन है। 

चले गए जिस राह प्रिय तुम,  जाना सबको उसी डगर,
पर इतनी जल्दी जाओगे सपने में भी अनुमान न था। 

चिरपरिचित मुस्कान तुम्हारी, सबका दुःख हर लेती थी 
पर उसको भी तेरी जरूरत, इसका हमको भान न था।

यूँ तो हर कोई तन्हा होता है, पर जब तुम थे अपनापन था। 
किसी के लिए भी कोई कब तक रोता है, पर जब बात चली, आँखों में गीलापन था।  

उपर्युक्त श्रृद्धांजलि हमारे विभाग के एक साथी लेक्चरर स्वर्गीय  डा. अंशुल कुमार राणा एवं विभागाध्यक्ष की धर्मपत्नी  स्वर्गीय श्रीमती श्वेता तिवारी के एक के बाद एक निधन के पश्चात लिखा गया।  यह श्रृद्धांजलि विभाग की स्मारिका वृद्धोत्थान २०१० की पृष्ठ संख्या ११ पर प्रकाशित हुयी, और नेशनल सी एम् इ इन जिरियाट्रिक साइकाइट्री -२०१० तथा वृद्धावस्था मानसिक स्वास्थ्य विभाग के पाचवें स्थापना दिवस के अवसर पर पढ़ा गया।   हम आज भी इन दोनों महानुभाओं को मिस करते हैं.………… 

खोलो निज मन द्वार सखी हे!

खोलो निज मन द्वार सखी हे!, खोलो निज मन द्वार,
परिवर्तन है जगत का नियम, करो इसे स्वीकार सखी हे! 
खोलो निज मन द्वार।  

आता बसंत उन्माद जगाने, वर्षा आती प्यास बुझाने 
ग्रीष्म कठिन संघर्ष सिखाये, शीत ताप से मुक्ति दिलाये,
समय -समय पर ऋतुएं बदलें, करो इनका आभास,
करो इनका सत्कार, होना न तु उदास सखी हे !
खोलो निज मन द्वार। 

ऐसा नहीं कि नीरस है मन, ऐसा नहीं कि आस नहीं है,
जीवन के विभिन्न रंगों की, मन में अपने चाह नहीं है,
जीवन के उत्थान -पतन का, निज मन में आभास नहीं है,
अच्छे -बुरे के द्वन्द में न पिसो, करो अपना उपकार सखी हे!
खोलो निज मन द्वार। 

तन चाहे मिल जाते लाखों, मन चाहा मुश्किल से मिलता,
मन चाहे को मीत बना लो, हृदय का करो  श्रृंगार,
मन चाहा अगर मीत मिले तो, चलो संग कदम चार, 
करो कुछ उसका भी उपकार, मिले हैं दिन जीवन में चार सखी हे !
खोलो मन के द्वार। 

बिना  स्वप्न उत्थान नहीं है, बिना जुड़े निर्माण नहीं है
सपने  पलकों पे सजने दो, मन के तारों को जुड़ने दो,
सपने पूरे जब होते हैं, खुशियाँ मिलती अपार सखी हे!
मिलन -विछोह जीवन के रस हैं, करो इनका रसपान सखी हे!
खोलो निज मन द्वार। 

परिवर्तन है जगत का नियम, करो इसे स्वीकार सखी हे! 
खोलो निज मन द्वार । 

अनुभूतियाँ, २०२०

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