Sunday, November 10, 2024

मैंने ये सोचकर


मैंने ये सोचकर, रोके अपने कदम ,
कि चीज़ किसी की, चुराना नहीं चाहिए ।।

जिसने भी दिल चुराया, न वापस किया,
जीने के वास्ते, दिल लगाया किये ।।

इस क़दर मामले में हैं आगे बढ़े, 
उनसे भी दिल लगा, जो किनारा किये ।।

वो धूप की नरमी और, वो हाॅस्टल की छत, 
बैठ किस्से उन्हीं के, सुनाया किये।।

डूब आंखों में उनकी, जियें कि मरें, 
अब तिनके का, सहारा किसे चाहिए।।

मैंने ये सोचकर, रोके अपने कदम ,
कि चीज़ किसी की, चुराना नहीं चाहिए ।।

-राकेश त्रिपाठी "प्रियांश"
श्री सुबोध कुमार सर से वार्तालाप के क्रम में दिनांक १०/११/२०२४ को  लिखी गयी .

अनुभूतियाँ, २०२०

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